मनोविज्ञान को जानने और समझने की बात तो सभी करते हैं , पर कहाँ गई लोगों के खुद के मन के अन्दर झांकने की क्षमता!! शायद ये भी धीरे- धीरे पाषाण युग के मानव की पूछ की तरह ही विलुप्त होती जा रही!!
मनोविज्ञान हो या फिर गीता में श्री कृष्ण के उपदेश , सभी जगह हमें अंतर्दर्शन का महत्त्व हमारे जीवन में देखने को मिलता है| आत्म ज्ञान भी हमे सच्चे अर्थों में तभी प्राप्त होता है जबकि हम अपने अन्दर की अच्छाईयों के साथ ही साथ अपने भीतर की कमियों को समझते भी हों और उसे भी उतना ही सहर्ष स्वीकार करते हों जितना सहर्ष हम अपनी अच्छाइयों को स्वीकारते हैं |
ऐसे देखा जाए तो मनोविज्ञान एक बहुत ही तेजी से आगे बढ़ रहा एक व्यावसायिक क्षेत्र बन रहा है और ये मनोविज्ञान के विशेषज्ञों के लिए एक खुशखबरी भी है, मगर वहीं हमारे समाज में बढ़ रहे नित नए -नए तरह के अपराध हमारे समाज के लिए एक बहुत बड़े खतरे के रूप में है जो की और भी दोगुनी तेजी से बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा |
ये सत्य है की हमारी इच्छाएं अनंत होती हैं पर साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए की रावन में अति महत्वाकांक्षी प्रवृत्ति अगर न होती तो उसे शायद उसकी बुद्धि , पराक्रम और अटल निश्चयशीलता उसे भगवान् राम से अगर ऊँचा नहीं तो किसी अर्थ में कमतर तो ना ही रखती | सर्वगुण युक्त होते हुए भी रावन की निश्चयशीलता उसकी हठधर्मिता के रूप में सदैव उसे आत्म-चिंतन और अंतर्दर्शन से रोकती रही और उसका यह अहंकार ना केवल उसके बल्कि उसके सभी शुभ चिंतकों के भी काल का कारण बना|
आज भी राम और रावन दोनों ही हमारे मन और मस्तिस्क के एक- एक भाग में विराजमान हैं | आवश्यकता बस इस बात की है की हम जीवन में सही और गलत के फर्क को खुद के अन्दर झाँकने के बाद सत्चिदानन्द ( सत्य +मन +आनंद ) भाव से स्वयं या फिर दूसरों के लिए भी अपनी राय भी बनाएं और आवश्यकता पड़ने पर उसे कार्यरूप में भी लायें | क्योंकि जब भी हमारे मन के आतंरिक भावों में उथल-पुथल होती है तभी तब हम किसी मनोविकार से ग्रसित होते हैं, जो की समय काल तथा परिस्थिति के अनुसार अपनी प्रकृति बदलता रहता है| अपने कर्तव्यों का बोध और उसका पालन किये बिना अपने अधिकारों की बात भी करना सही अर्थों में एक मानवीय भूल मात्र ही नहीं बल्कि एक अपराध है जो कि पूरे समाज के लिए विघटनकारी ही होता है| इस विपरीत परिस्थिति के उत्पन्न होने तथा इसके दुस्प्रभाव से स्वयं तथा समाज के सभी व्यक्ति सुरक्षित रहें, ये सुनिश्चित करना हम सभी का नैतिक कर्त्तव्य है |